Tuesday, November 6, 2007
हमारे देश में जितनी धर्म की छिछालेदारी होती है उतनी किसी भी देश में नहीं होती है। धर्म जो धारण का ही पर्यायवाची है उसी का लोग आडम्बर के रुप में इस्तेमाल करने लगे हैं। धर्म धारना का नहीं तारना का विकल्प बन चुका है। आख़िर हम कब तक धर्म को पाखंड के रुप में इस्तेमाल करते रहेंगे। पिछले दिनों राम के नाम पर बड़ा बवाल खड़ा हो गया । राम की आदर्शवादिता को हम भूल गए और रावण के गुणगान करने से हम नहीं थकते। हमारी यह सोच हमें कहाँ ले जायेगी। देवी देवता, पैगम्बर फरिश्ते मानव मन के सदगुणों के परिचायक हैं, उनके ऐतिहासिकता को भूनाना नहीं चाहिऐ। राम हमारी अस्मिता हैं, मन प्राण में बसे हैं, उनके साथ खिलवाड़ करना अपना अहित करना ही है।
Wednesday, October 24, 2007
Subscribe to:
Comments (Atom)